Saturday, August 22, 2020

वो सुमिरण एक न्यारा रे by Prahlad Singh ji Tipaniya


जब मन स्थिरता की ओर आ जायेगा तो सुमिरण में लग जायेगा, वो सुमिरण जो न्यारा है, उस सुमिरण की ओर सदगुरु कबीर ने यहां पर ईशारा किया है!
जिसमें ना तो किसी माला  की जरुरत है ओर ना किसी शब्द की जरुरत है!
वह सुमिरण हर जीव में अखण्ड रुप से प्रवाहित हो रहा है!
वहाँ ना किसी जाति की जरुरत है ना किसी धर्म की, ना मजहब की, ना सम्प्रदाय की जरुरत है!
इसी सुमिरण के बारे में सदगुरु कबीर ने यहाँ पर इस तरह से कहा है!

सुमिरण की सुध युं करो, ज्यों गागर पणिहार!
हाले डोले सुरत में, ओर कहे कबीर विचार!
सुमिरण सुरती साध के, ओर मुख से कछु ना बोल!
तेरे बाहर के पट देई के, तेरे अंतर के पट खोल!!
एसा सुमिरण किजिये, सहज रहे लव लाय!
बिन जिव्ह्या बिन तालवे, ओर अंतर सुरत लगाय!!

वो सुमिरण एक न्यारा रे संतो...
वो सुमिरण एक न्यारा है...
जिस सुमिरण से पाप कटे है...
होवे भव जल पारा है...

मालण कर मुख जिव्ह्या ना हाले
आप ही होत उच्चारा है
सब ही के घट रचना रे लागी
क्यों नहीं समझे गंवारा रे संतो... -----(1)

अखंड तार टुटे नहीं कबहु
सोहंग शब्द उच्चारा है...
ग्यान आंख मोरे सतगुरु खोले...
जानेगा जानण्हारा है...-----(2)

पुरब पश्चिम उत्तर दक्शिण...
चारो दिशाओं में पचहारा है...
कहे कबीर सुनो भाई साधो...
एसा शब्द लेओ टकसारा रे संतो... -----(3)

Monday, August 17, 2020

शुन्य घर शहर, शहर घर बस्ती... by Prahlad Singh Ji Tipaniya


साहब कबीर ने इस भोतिक पिरवेश में जहां पर जो देखा,उसके मुताबिक मानवमात्र को चेतना,जाग्रति व संदेश दिया है! उन्होनें अपनी उलट्वासियों के माध्यम से मानवमात्र को एक विशेष चेतना दी है!

उनकी उलट्वासियां जो अपनें आप में अहम स्थान रखती है उसी में एक शब्द इस तरह से है-

शुन्य घर शहर, शहर घर बस्ती...

कौन सुता कौन जागे है...

लाल हमारा हम लालन के...

तन सुता ब्रह्म जागे है...


सकल पसारा पवन का, ओर सात द्वीप नव खंड!

सोहम नाम उस पवन का, जो गरजे ब्रह्मंड!!


जात हमारी आत्मा, ओर प्राण हमारा नाम!

अलख हमारा ईष्ट है, ओर गगन हमारा गांव!!


सिर्गुण आया जीव यह, निर्गुण जाय समाय!

सुरती डोर ले चड चला, ओर सतगुरु दिया बताय!!


शुन्य घर शहर, शहर घर बस्ती...

कौन सुता कौन जागे है...

लाल हमारा हम लालन के...

तन सुता ब्रह्म जागे है...

जल बिच कमल, कमल बिच कलियां, भंवर बास ना लेता है

पांचो रे चेला फिरे अकेला, अलख अलख वो करता है!-----(1)

शुन्य घर शहरशहर घर बस्ती...

जीवत जोगी माया रे जोडीजोडी, मुआ पिछे माया मानी है

खोज्या रे खबर पडे घट भीतर, जोगाराम जी की वाणी है!-----(2)

तपत कुंड पर तपसी रे तापे, तपसी तपस्या करता है

शुन्य घर शहरशहर घर बस्ती...

कांछ लगोटा कुछ नहिं रखता, लंबी माला भजता है!-----(3)

शुन्य घर शहरशहर घर बस्ती...

जल का मनका पात बिन पोया, सुआ हाथ का धागा है,

तीन लोक का वस्त्र पहरिया, तो भी निरंजन नागा है!-----(4)

शुन्य घर शहरशहर घर बस्ती...

एक अप्सरा आगे रे उबी(खडी), दुजी सुरमो सारे है,

तीजी अप्सरा सेज बिछावे, परणी नहीं कुंवारी है!-----(5)

शुन्य घर शहरशहर घर बस्ती...

परणिया से पहले पुत्र जनमिया, मात-पिता मन भाया है,

रामानंद का भणे कबीरा, एक अखंडित ध्याया है! -----(6)

शुन्य घर शहरशहर घर बस्ती...

Saturday, August 15, 2020

म्हाने संत संगत प्यारी लागे हे माय by Prahlad Singh Ji Tipaniya


म्हाने  संत संगत प्यारी लागे हे माय

by Prahlad Singh Ji Tipaniya

म्हाने  संत संगत प्यारी लागे हे माय

म्हारो मन लाग्यो इणा भजना में

महल अटरिया म्हारे नहीं सुहावे रे...

म्हारे जंगल की कुटिया प्यारी लागे है माय-----(1)

हीरा जवाहरात म्हारे नहीं सुहावे रे

म्हारे फुलों की माला प्यारी लागे है माय------(2)

खीर खाण्ड का भोजन म्हाने नहीं सुहावे रे

म्हारे शब्दा री खीर प्यारी लागे है माय------(3)

मीरा को प्रभु गुरधर मिल गया रे...

गुरु चरणों की बलिहारी है माय------(4)

 

  

Thursday, July 23, 2020

एकला मत छोड़जो बंजारा रे Ekla Mat Chod jo Banjara Re by Prahlad Singh ji Tipaniya




एकला मत छोड़जो बंजारा रे
Ekla Mat Chod jo Banjara Re
गायक-प्रह्लाद सिंह जी टिपानिया भजन
Singer: Prahlad Singh ji Tipaniya 

सब आया एक ही घाट से, ओर उतरे एक ही घाट।
पर बीच में दुविधा पड़ गई, तो हो गए बारह बाट।।

कबीर कुआ एक है, ओर पणिहारी है अनेक।
बर्तन का है आंतरा, ओर नीर एक का एक।।

एकला मत छोड़जो बंजारा रे, बंजारा रे।
परदेस का है मामला, टेड़ा हो प्यारा रे।।

अपना साहब जी ने बंगलो बणायो, बंजारा रे, बंजारा रे।
ऊपर रखिया झरोखां, झाँक्या करो प्यारा रे।।_____(1)

एकला मत छोड़जो बंजारा रे, बंजारा रे।
परदेस का है मामला, टेड़ा हो प्यारा रे।।

अपना साहब जी ने बाग लगायो, बंजारा रे, बंजारा रे।
फूलां भारी है छाबड़ी, पोया करो प्यारा रे।।_____(2)

एकला मत छोड़जो बंजारा रे, बंजारा रे।
परदेस का है मामला, टेड़ा हो प्यारा रे।।

अपना साहब जी ने कुओ खोदायो, बंजारा रे, बंजारा रे।
गहरा भरिया नीर वहां, नहाया करो प्यारा रे।।_____(3)

एकला मत छोड़जो बंजारा रे, बंजारा रे।
परदेस का है मामला, टेड़ा हो प्यारा रे।।

कहे कबीर धरमदास से, बंजारा रे, बंजारा रे।
सत अमरापुर पाविया, सौदागर प्यारा रे।।_____(4)

एकला मत छोड़जो बंजारा रे, बंजारा रे।
परदेस का है मामला, टेड़ा हो प्यारा रे।।

Wednesday, July 22, 2020

बिना चंदा रे, बिना भान Bina Chanda Re Bina Bhan by Prahlad Singh ji Tipaniya

संतों के शब्दों में अनेक महापुरुष हुए सभी का संदेश शब्दों के जरिए मानवमात्र को चेतना प्रदान करना है। परंतु उस भूमिका पर जाने के बाद भी हमें एहसास होता है कि वहां पर न किसी प्रकार का राग है,न द्वेष है, ओर ना ही वह किसी प्रकार की स्थिति को निरूपित होता है। वहाँ पर बनानाथ जी ने, भवानीनाथ जी ने अनेक प्रकार से समझाया है। इस भजन में भवानीनाथ जी ने कहा है।

बिना चंदा रे, बिना भान 
Bina Chanda Re Bina Bhan
गायक-प्रह्लाद सिंह जी टिपानिया भजन अमृतवाणी 
Singer: Prahlad Singh ji Tipaniya 
जल में बसे कुमुदिनी, चंदा बसे आकाश।
ज्यो जिसके हिरदे बसे, वो ही उसी के पास।।

बिन पावन का पंथ है, बिन बस्ती का देस।
बिना पिण्ड का पुरूष है, कहे कबीर संदेस।।

बिना चंदा रे, बिना भान,
सूरज बिना होया उजियारा रे।

परलोक मत जाओ हेली,
निरख लो यहीं उजियारा है।

हैली म्हारी, गूँगों गावे है अब राग,
बेरो(बहरा) अब सुणवा(सूनने) ने लागो है।

पांगलीयो(लूला) नाचे घणो नाच ,हैली,
आन्दलियो(अंधा) नरखण(देखना) लागो है।_____(1)

हैली म्हारी, बिना चंदा रे, बिना भान,
सूरज बिना होया उजियारा रे।

परलोक मत जाओ हेली,
निरख लो यहीं उजियारा है।

हैली म्हारी, गगन मण्डल के बीच,
तापे एक जोगी मतवाला रे।

नहीं अग्नि ना भभूत हेली,
नहीं कोई तापण वालो है।_____(2)

हैली म्हारी, बिना चंदा रे, बिना भान,
सूरज बिना होया उजियारा रे।

परलोक मत जाओ हेली,
निरख लो यहीं उजियारा है।

हैली म्हारी, शून्य शिखर के बीच,
मच्यो एक झगड़ो भारी है।

नहीं कायर को वहाँ काम हैली,
कायर को कई पतियारो है।_____(3)

हैली म्हारी, बिना चंदा रे, बिना भान,
सूरज बिना होया उजियारा रे।

परलोक मत जाओ हेली,
निरख लो यहीं उजियारा है।

हैली म्हारी, गावे गुलाबीदास,
खुल्या म्हारा हिरदा(हृदय) का ताला है।

बोल्या भवानीनाथ हैली,
हुआ म्हारा घट उजियारा है।_____(4)

हैली म्हारी, बिना चंदा रे, बिना भान,
सूरज बिना होया उजियारा रे।

परलोक मत जाओ हेली,
निरख लो यहीं उजियारा है।

Tuesday, July 21, 2020

पीले अमीरस धारा Peele Amigas Dhara by Prahlad Singh ji Tipaniya

पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी। 
Peele Amiras Dhara, Gagan Me Jhadi Lagi
गायक-प्रह्लाद सिंह जी टिपानिया भजन
Singer: Prahlad Singh ji Tipaniya 

बिना सूरज ओर चांद के प्रकाश हो, एसी भूमिका पर जाने पर उसे सभी ओर
वही(भगवान) दृष्टिगोचर होता है। परन्तु  यह तभी संभव है, जब हमें सतगुरु के द्वारा उस अमृतमयी धारा का पान करवाया जाए। और जीवमात्र की प्यास बुझाई जाये। यहाँ पर सतगुरु कबीर ने इस तरह से कहा है।

अमृत केरी मोठरी, राखो सतगुरु छोर।
आप सरिका जो मिले, ताही पिलावे छोड़।।

अमृत पीवे ते जणा, सतगुरु लागा कान।
वस्तु अगोचर मिल गई, मन नहीं आवे आन।।

पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।

झड़ी लगी, यहाँ झड़ी लगी।
पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।।

बुंद का प्यासा, घड़ा भर पाया।
सपने में वो, स्वाद न आया।।

कोई किसे, कैसे समझाए।
एक बुंद की तरण(प्यास) लगी।।_____(1)

पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।

झड़ी लगी, यहाँ झड़ी लगी।
पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।।

प्यास बिना क्या, पीवे है पानी।
प्यास अकेली, ये है वो पानी।।

बिना अधिकार, कोई नहीं जानी।
अमृत रस की, झड़ी लगी।।_____(2)

पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।

झड़ी लगी, यहाँ झड़ी लगी।
पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।।

आमीरस पीवे, ऊमर पद पावे।
भवयोनी में, कभी नहीं आवे।।

जरा-मरण का दुख नसावे।
घट की गगरिया भरण लगी।।_____(3)

पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।

झड़ी लगी, यहाँ झड़ी लगी।
पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।।

बून्द अमीरस गुरु जी की वाणी।
जीवन रास्ता है, यह पानी।।

कबीर संगत में, हो हमारी।
डाली प्रेम की हरी लगी।।_____(4)

पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।

झड़ी लगी, यहाँ झड़ी लगी।
पीले अमीरस धारा, गगन में झड़ी लगी।।

Friday, July 17, 2020

करना होये सो करले रे साधो Karna Hoye So Karle Re Saadho by Prahlad Singh ji Tipaniya

जब संतो के शब्दों को, संतो के अगम संदेश को जान लेंगे, तभी हमें क्या करना है, क्या कर रहे हैं।
इसका बोध होगा।
क्योंकि मनुष्य तन मिलने के बाद भी यदि हम आपस में प्रेम और भाईचारे से नहीं रहे।
तो हम किसी अन्य योनी में नहीं कर सकते।
मनुष्य ही मानव की सेवा कर सकता है, और यही पर, वह परमात्मा सभी में मौजूद है।
उसको खोजने के लिए कहीं भी भटकने की जरूरत नहीं है।
इसीलिए बनानाथ जी साहब ने इस तरह से कहा है।

करना होये सो करले रे साधो...
Karna Hoye So Karle Re Saadho
गायक-प्रह्लाद सिंह जी टिपानिया भजन अमृतवाणी 
Singer: Prahlad Singh ji Tipaniya 

करना होये सो करले रे साधो...
मनक(मनुष्य) जनम दुहेलो(कठिन) है...

लख चौरासी में भटकत भटकत,
अबके मिल्यो महेलों(अवसर) है।

करना होये सो करले रे साधो...


इस तरह से चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य की योनी मिली है।
एसा संत कहते हैं। तो इस तन को पाकर हम कुछ कर लें।
क्या कर लें?
नैकी के साथ, सतज्ञान के साथ, सतनाम के साथ जुड़ जाएँ।
हर इंसान के साथ हमारा प्रेम ओर सदभाव हो।
मानव की सेवा कर लें, यही तो करना है।ओर यही सच्ची पूजा-पाठ है।

जप, तप, नियम, वृत ओर पूजा,
षठ दर्शन को गेलो(चक्कर) है।

पार-ब्रह्म को जानत नाहीं,
भुल्या भरम(अंधविश्वास) बहेलो है।_____(1)

करना होये सो करले रे साधो...
मनक(मनुष्य) जनम दुहेलो(कठिन) है...

लख चौरासी में भटकत भटकत,
अबके मिल्यो महेलों(अवसर) है।

करना होये सो करले रे साधो...

इस तरह से यहाँ पर बनानाथ जी साहब स्पष्ट कहते हैं कि जब तक तु पूजा-पाठ, जप-तप, तीर्थ-वृत में उलझा रहेगा।
या षठ दर्शनों की संगती करता रहेगा, उस परमात्मा की प्राप्ति के लिए।
तो, तु भुल-भुल में अपने जीवन को गंवा देगा। क्योंकि वह परमात्मा तो सब तरफ है।
इसलिए उसका दीदार करने के लिए सबकी सेवा कर ले।
परन्तु हमारे मन में इस तरह का विश्वास है, की वह परमात्मा तो सतलोक में है, वह परमात्मा अमरलोक(बेकुंठ) में है।
जबकि सच्चा परमात्मा तो, हर मानवमात्र के अंदर है।
इसीलिए उन्होंने कहा है...

कोई कहे हरी(भगवान) बसे बेकुंठा,
कोई गौलोक कहेलो (कहता) है।

कोई कहे शिव नगरी में साहब,
युग-युग हाथ बहेलो है।_____(2)

करना होये सो करले रे साधो...
मनक(मनुष्य) जनम दुहेलो(कठिन) है...

लख चौरासी में भटकत भटकत,
अबके मिल्यो महेलों(अवसर) है।

करना होये सो करले रे साधो...

उस परमात्मा के निवास के बारे में इस प्रकार की भावना रही है, कि वह बैकुंठ में, गौलोक में, सतलोक में है।
परंतु वे सब लोक तो यहीं पर है, जहां संतो का सानिध्य है, सत्संग है।
जहाँ पर सत्य का साथ है, वही तो सतलोक है।
इसीलिए उनकी संगती करने की जरूरत है। ओर इस प्रकार कि स्थिति, ओर इस प्रकारका बोध कराने के लिए यदि कोई कहता है कि परमात्मा अमरलोक में है, गौलोक में है।
तो यह समझिए कि वह अज्ञानी, नासमझ है। 
क्योंकि संतो ने कहा है। इसीलिए बनानाथ जी कहते है

नासमझ(मूर्ख) हरि दूर बतावे,
कोई समझ्या(ज्ञानी) साथ कहेलो है

सतगुरु सेण(समझ) अमोलक दिन्ही,
हरदम हरी को गेलो(साथ) है।_____(3)

करना होये सो करले रे साधो...
मनक(मनुष्य) जनम दुहेलो(कठिन) है...

लख चौरासी में भटकत भटकत,
अबके मिल्यो महेलों(अवसर) है।

करना होये सो करले रे साधो...

देखिएगा, यहां पर बनानाथ जी साहब स्पष्ट कहते हैं कि अज्ञानी लोग हरि को दूर बताते हैं और ज्ञानी हमेशा उस परमात्मा को साथ बताता है।
अर्थात, उस परमात्मा को,उस वाहेगुरु,उस अल्लाह को जो दूर बताते है, वो नासमझ हैं।
परंतु, वो कहाँ पर है? सतगुरु सैण(समझ) अमोलक दीन्ही, ओर हरदम हरी को गेलो(साथ) है।
वो तो यह कह रहे हैं कि उसका गेला(साथ) तो हरदम सभी के साथ है।
परंतु इस प्रकार की सैण, इस प्रकार का इशारा, इस प्रकार की समझ, इस प्रकार कि परख हमें सच्चे सतगुरु से मिलती है इसलिए ऐसी अमोलक समझ को लेकर जो सब घट में जो व्यापक है। उस परमात्मा के साथ जुड़ने का प्रयास करें। उसी की सेवा करने की बात करें। उसी की पूजा-पाठ, पूजा-अर्चना करें।इसीलिए यहाँ पर बनानाथ जी साहब ने इस तरह से कहा है।

जियाराम गुरु पूरा महाने मिल गया,
अजपा जाप जपेलो(सुमिरण) है।

कहे बनानाथ सुनो भाई साधो,
म्हारा सतगुरु जी को हेलो(कहना) है।_____(4)

करना होये सो करले रे साधो...
मनक(मनुष्य) जनम दुहेलो(कठिन) है...

लख चौरासी में भटकत भटकत,
अबके मिल्यो महेलों(अवसर) है।

करना होये सो करले रे साधो...

इस तरह से बनानाथ जी साहब ने साफ शब्दों में कहा है कि सच्चे गुरु का संदेश परख ओर पारख का भेद यही है कि,वो परमात्मा सभी में व्यापक है, सभी में विद्यमान है।
इसीलिए उसकी खोज यही पर कर लें। इसलिए क्या करना है?
यही(भजन) करना है।

करना होये सो करले रे साधो...
मनक(मनुष्य) जनम दुहेलो(कठिन) है...

लख चौरासी में भटकत भटकत,
अबके मिल्यो महेलों(अवसर) है।

करना होये सो करले रे साधो...

वो सुमिरण एक न्यारा है Wo Sumiran Ek Nyara Hai Kabir Bhajan Lyrics

  सुमिरण की सुध युं करो , ज्यों गागर पणिहार हाले डोले सुरत में , कहे कबीर विचार सुमिरण सुरती साध के , मुख से कछु नहीं बोल तेरे बाहर के पट दे...